20 सितम्बर, 2020|8:58|IST

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वही पुराना खेल, वही पुराना दांव

जमात-उद-दावा प्रमुख और लश्कर-ए-तैयबा सुप्रीमो हाफिज सईद को मिली साढ़े पांच-साढ़े पांच साल की सजा पाकिस्तान की नई पैंतरेबाजी है। पिछले डेढ़-दो साल से उस पर फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की तलवार लटकी हुई है। पाकिस्तान इस दबाव से बाहर निकलने के लिए लगातार छटपटा रहा है। वह न सिर्फ ग्रे लिस्ट (इसमें अभी वह शामिल है) से बाहर निकलने के लिए बेचैन है, बल्कि काली सूची में जाने से बच निकलने की जुगत भी कर रहा है। इसी के तहत उसने हाफिज सईद को निचली अदालत द्वारा सजा दिलवाने का दांव खेला है। किसी अंतरराष्ट्रीय आतंकी पर कार्रवाई करके वह यह दिखाना चाहता है कि आतंकी गुटों से अपने रिश्ते तोड़ने को लेकर वह सक्रिय हो गया है। हाफिज सईद को जिन दो मामलों में सजा सुनाई गई है, उनमें पहला आतंकी गुटों से रिश्ते का है, तो दूसरा आतंकी फंडिंग का। दूसरा मामला सीधे तौर पर एफएटीएफ के दबाव का असर है।

पिछले साल अक्तूबर में जब एफएटीएफ की बैठक हुई थी, तब उसमें पाकिस्तान की काफी मजम्मत की गई थी। उसे फरवरी 2020 तक इसलिए मोहलत दी गई, क्योंकि उसने एफएटीएफ द्वारा तय 27 मापदंडों में से चार पर काफी काम किया था। हालांकि उसने चार मापदंडों को बिल्कुल नजरंदाज कर दिया था और शेष 19 पर थोड़े-बहुत ही काम किए थे। फिर, एक तथ्य यह भी था कि किसी देश की संजीदगी तय करने के 11 मापदंडों में से 10 में पाकिस्तान को काफी कम अंक मिले थे, जबकि एक में अपेक्षाकृत सुधार के लक्षण दिखे थे। इस तरह, एफएटीएफ की आगामी बैठक (यह चंद दिनों के बाद होने जा रही है) को लेकर पाकिस्तान पर स्वाभाविक दबाव बना हुआ था।

फिलहाल पाकिस्तान ने पुराना खेल ही खेला है। एफएटीएफ की हर बैठक से पहले वह तमाम तरह के कायदे-कानून बनाने की कवायद करता है। अपने प्रशासनिक अमले को ऐसे निर्देश देता दिखता है कि आतंकी फंडिंग रोकने के लिए वह काफी संजीदा हो गया है। ऐसा आमतौर पर बैठक से हफ्ते-दो हफ्ते पहले किया जाता है और इसकी मीडिया में जमकर प्रशंसा की जाती है। हालांकि ऐसे दुष्प्रचार का एफएटीएफ की बैठक पर शायद ही असर पड़ता है, क्योंकि जवाबी सवाल-जवाब में पाकिस्तान हमेशा फंसता रहा है। लिहाजा अगली बैठक में ऐसी कोई गलती न हो, इसीलिए हाफिज सईद को सजा देने की नई चाल चली गई है।

दिक्कत यह है कि अपनी इस चाल में पाकिस्तान कामयाब होता भी दिख रहा है। हाफिज सईद को मिली सजा का अमेरिकी और पाकिस्तान-समर्थक विश्लेषकों ने स्वागत किया है। खबर है कि अमेरिका ने ऐसे संकेत दे दिए हैं कि वह पाकिस्तान को एफएटीएफ की काली सूची में डालने का इच्छुक नहीं है, हालांकि वह यह भी चाहता है कि पाकिस्तान ग्रे लिस्ट में बना रहे, ताकि उस पर दबाव डालकर काम करवाया जा सके। बेशक हाफिज सईद जैसे बड़े दहशतगर्दों के खिलाफ पाकिस्तान में अपनी तरह की यह पहली कार्रवाई हुई है, लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि आतंकी फंडिंग को रोकने को लेकर पाकिस्तान वाकई गंभीर हो गया है।

असल में, हाफिज सईद को जिस तरह से सजा सुनाई गई है, उसमें कई कानूनी छिद्र हैं। इसीलिए निचली अदालत का यह फैसला आला अदालत में शायद ही टिके। फिर, अपील के लिए 30 दिनों का वक्त इस आतंकी के पास है। यानी, तब तक एफएटीएफ की बैठक खत्म हो चुकी होगी और आतंकी पर कार्रवाई करने को लेकर गाल बजाने का पूरा मौका पाकिस्तान को मिल चुका होगा। साफ है, पाकिस्तान दो तरह से फायदा उठाने की मंशा पाल रहा होगा। एक, काली सूची में जाने का खतरा वह टाल सकेगा और दूसरा, आला अदालत द्वारा हाफिज सईद की आसन्न रिहाई का तोहमत अदालत पर डालकर यह साबित करने की कोशिश करेगा कि उसकी नीयत तो साफ है, पर अदालत के खुदमुख्तार होने के कारण उसके हाथ-पैर बंधे हुए हैं।

इन सबके बावजूद इस पूरे मामले में दो अन्य आशंकाएं भी हैं। पहली, संभव है कि हाफिज सईद की सजा बरकरार रहे। अगर ऐसा होता है, तो हुकूमत के लिए यह सिरदर्द होगा कि वह उसे कहां और कैसे रखे? क्या जेल को ही उसके ऐशो-आराम का ठिकाना बनाया जाएगा (जिस तरह जकीउर रहमान लखवी की खातिरदारी मुंबई हमलों के बाद जेल में की गई थी) और वहीं से उसे अपने नेटवर्क चलाने की अनुमति दी जाएगी, या फिर उसके घर को ही जेल में तब्दील कर दिया जाएगा? अगर यह तस्वीर बनी, तब भी हाफिज सईद की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है।

दूसरी आशंका यह है कि पाकिस्तानी हुकूमत लश्कर-ए-तैयबा ब्रांड खत्म करने की सोच रही हो। ऐसा इसलिए, क्योंकि यह संगठन दुनिया भर में बदनाम हो गया है। लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं निकालना चाहिए कि पाकिस्तान वाकई हाफिज सईद पर कानूनी कार्रवाई करेगा। अगर ऐसा हुआ, तो पाकिस्तान में पल रहे लश्कर के हजारों लड़ाके विद्रोह कर सकते हैं। लिहाजा हाफिज सईद का इस्तेमाल बंद करके उसकी जगह नया नेतृत्व और नया संगठन खड़ा करने की मंशा पाकिस्तान की हो सकती है।

इन दोनों आशंकाओं के बीच एक सवाल यह भी है कि क्या हाफिज सईद के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करके पाकिस्तान बतौर विदेशी नीति पड़ोसियों के खिलाफ दहशतगर्दों का इस्तेमाल बंद करने का संकेत दे रहा है? कम से कम, निचली अदालत की इस कार्रवाई से ऐसा होता नहीं दिख रहा है। हालांकि इसमें तब्दीली यह आ सकती है कि नए कलेवर के साथ नए आतंकी पैदा किए जाएं, ताकि पुराने नेतृत्व या संगठन से उसका नाम न जोड़ा जा सके। इसीलिए फिलहाल पाकिस्तान अपनी पुरानी नीति पर ही कायम दिख रहा है। हाफिज सईद की इस सजा के नाम पर वह सबकी आंखों में धूल झोंकने की कोशिश में है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column 14 February 2020