22 फरवरी, 2020|12:45|IST

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राजनीतिक दल बताएंगे कि दागी नेता को टिकट क्यों दिया?

राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण से चिंतित उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार (13 फरवरी) को सभी राजनीतिक दलों को निर्देश दिया कि वे चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों का विवरण अपनी वेबसाइट पर डालें। साथ ही बताएं कि ऐसे व्यक्तियों को प्रत्याशी के रूप में चयन क्यों किया जिनके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं।

आरएफ नरिमन की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि ऐसे प्रत्याशियों के चयन को चुनाव में जीतने की संभावना से अलग उनकी योग्यता और मेरिट न्यायोचित ठहराने की वजह भी बतानी होंगी जिनके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। पीठ ने यह आदेश राजनीति के अपराधीकरण के मुद्दे पर शीर्ष अदालत के सितंबर, 2018 के फैसले से संबंधित निर्देशों का पालन नहीं करने के आधार पर दायर अवमानना याचिका पर दिए। इस फैसले में अदालत ने प्रत्याशियों की आपराधिक पृष्ठभूमि के विवरण की घोषणा के बारे में निर्देश दिए थे।

72 घंटे में आयोग को रिपोर्ट दें
पीठ ने राजनीतिक दलों को यह भी निर्देश दिया कि वे पूरा विवरण फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया मंच पर सार्वजनिक करने के साथ ही एक स्थानीय भाषा और एक राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्र में इसका प्रकाशन करें। यदि राजनीतिक दल ऐसे प्रत्याशियों का चयन करते हैं जिनका आपराधिक रिकॉर्ड है तो इसकी सूचना 48 घंटों के अंदर या नामांकन दाखिल करने की पहली तारीख से दो हफ्ते के अंदर प्रकाशित करनी होगी। इसके बाद राजनीतिक दल 72 घंटे के अंदर यह सूचना निर्वाचन आयोग को अनुपालन रिपोर्ट के रूप में देंगे। कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि यदि राजनीतिक दल उसके निर्देशों का पालन करने में विफल रहते हैं तो वह इसे शीर्ष अदालत के संज्ञान में लाए जिसके बाद अवमानना की कार्रवाही की जाएगी।

दागी नेताओं की संख्या बढ़ी  
पीठ ने यह आदेश सुनाते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि पिछले चार आम चुनावों में राजनीति के अपराधीकरण में चिंताजनक वृद्धि हुई है। 2004 में हुए आम चुनावों में 24 फीसदी सांसद दागी थे, 2009 में यह संख्या 30 फीसदी हुई, 2014 में 34 फीसदी सांसद आपराधिक रिकार्ड वाले हो गए और 2019 में यह संख्या 43 फीसदी तक पहुंच गई। राजनीतिक दल यह बताने में विफल रहे हैं कि आखिर क्यों आपराधिक केस लंबित रहने वाले लोगों को टिकट दिए गए। इसलिए हम संविधान के अनुच्छेद 142 तथा 139 के तहत निर्देश जारी कर रहे हैं।

पहले दिए निर्देश
सितंबर, 2018 में पांच जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से अपने फैसले में कहा था कि सभी प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने से पहले निर्वाचन आयोग के समक्ष अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि की घोषणा करनी होगी।  इस विवरण का प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में प्रमुखता से प्रचार और प्रकाशन करने पर भी जोर दिया था। राजनैतिक दल उम्मीदवारों के इस विवरण को दलों की वेबसाइट पर डालेंगे।  

कानून बनाने का काम संसद पर छोड़ दिया था
अदालत ने दागी लोगों को राजनीति से अलग रखने के लिए कानून बनाने का काम संसद पर छोड़ दिया था। इस मामले में सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग ने कहा था कि ऐसे सांसदों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं।

पहले कहा
शीर्ष अदालत ने इससे पहले टिप्पणी कि थी कि आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी नहीं देने वाले प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों पर दंड लगाने के मुद्दे पर बहुत ही सावधानी से विचार करना होगा क्योंकि अक्सर विरोधी प्रत्याशी राजनीतिक भाव के साथ गंभीर आरोप लगाते हैं।

सुझाव माना
आयोग ने भाजपा नेता एवं याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण के इस सुझाव से सहमति व्यक्त की थी कि सभी राजनीतिक दलों के लिए अपने प्रत्याशियों की आपराधिक पृष्ठभूमि अपनी वेबसाइट पर अपलोड करना अनिवार्य किया जाए।

दंडित करने पर सहमत नहीं
आयोग आपराधिक पृष्ठभूमि की घोषणा करने में विफल रहने वाले प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों को संविधान के अनुच्छेद 324 के दंडित करने के सुझाव से सहमत नहीं था। आयोग ने शीर्ष अदालत के फैसले के बाद 10 अक्टूबर, 2018 को फार्म 26 में संशोधन करते हुए एक अधिसूचना भी जारी की थी।

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  • Web Title:Political Party upload details of pending criminal cases against candidates on website